Jai Maa Kali
Автор: KIRTI BHAN PANDEY
Загружено: 2025-12-25
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मां काली सबसे बड़ी शक्तियों में से एक मानी जाती हैं काली, कालिका या महाकाली हिन्दू धर्म की एक प्रमुख देवी हैं। वे मृत्यु, काल और परिवर्तन की देवी हैं। यह सुन्दरी रूप वाली आदिशक्ति दुर्गा माता का काला, विकराल और भयप्रद रूप है, जिसकी उत्पत्ति असुरों के संहार के लिए हुई थी। उनको विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार और असम में पूजा जाता है। काली को शाक्त परंपरा की दस महाविद्याओं में से एक भी माना जाता है। वैष्णो देवी में दाईं पिंडी माता महाकाली की ही है।
काली' की व्युत्पत्ति काल या समय से हुई है जो सबको अपना ग्रास बना लेता है। माँ का ये रूप है जो नाश करने वाला है पर यह रूप सिर्फ उनके लिए है जो दानवीय प्रकृति के हैं, जिनमे कोई दयाभाव नहीं है। ये रूप बुराई से अच्छाई को जीत दिलवाने वाला है इसलिए माता काली अच्छे मनुष्यों की शुभेच्छु और पूजनीय हैं। इनको महाकाली भी कहते हैं।
काली पूजा या श्यामा पूजा मुख्य रूप से बंगाल, त्रिपुरा, ओड़िशा, असम में प्रचलित एक हिंदू पर्व है। देवी काली को समर्पित यह पर्व आश्विन या कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। हालांकि इस दिन पूरे भारत में लक्ष्मी पूजा मनाई जाती है, लेकिन देवी के बंगाली, त्रिपुरी, ओडिया और असमिया भक्त इस दिन काली पूजा करते हैं। इसके अलावा, बंगाली कैलेंडर के माघ महीने की कृष्ण चतुर्दशी तिथि पर रटन्ती काली पूजा और ज्यैष्ठ महीने की अमावस्या तिथि पर फलहारिणी काली पूजा भी काफी लोकप्रिय हैं। बंगाली कैलेंडर के ज्यैष्ठ महीने की अमावस्या के दिन श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव ने देवी षोड़शी के रूप में मां सरदादेवी की पूजा की थी। वह दिन था फलहारिणी काली पूजा। इस संदर्भ में यह बात ध्यान देने योग्य है कि आज भी रामकृष्ण मठ एवं मिशन में इस पूजा को षोड़शी पूजा के नाम से जाना जाता है। षोड़शी पूजा का विवरण स्वामी सारदानंद द्वारा लिखित 'श्री श्री रामकृष्ण लीलाप्रसंग' और ब्रह्मचारी अक्षय चैतन्य द्वारा लिखित 'श्री श्री सारदादेवी' पुस्तकों में मिलता है। आज भी बेलूर मठ में 'ठाकुर' के गर्भगृह में 'ठाकुर' के बाईं ओर माता का चित्र रखकर पूजा की जाती है। इस आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण घटना की स्मृति में, यह फलहारिणी काली पूजा कई स्थानों पर बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। योग-भक्ति पथ के सिद्ध संत भादुड़ी महाशय (Bhaduri Mahasaya) यानि महर्षि नगेंद्रनाथ को दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव के सान्निध्य में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।इसलिए, यह फलहारिणी काली पूजा कोलकाता के राजा राममोहन राय रोड पर श्रीश्रीनागेंद्र मठ और नागेंद्र मिशन में भी गहन सम्मान और भक्ति के साथ आयोजित की जाती है, यह वह स्थान है जहां महर्षि नागेंद्रनाथ ने अपना अंतिम जीवन बिताया था।
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