शेखावत वंश के वो 5 महान योद्धा जो सर कटने के बाद भी युद्ध लड़े ।। Top 5 Shekhawat Rajputs Warriors
Автор: Times Of Rajasthan
Загружено: 2021-04-28
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दोस्तों आज हम शेखावत वंश के उन 5 महान योद्धा के बारे में आपको बताएंगे जो सर कटने के बाद भी युद्ध लड़ते रहे।
शेखावत वंश, कच्छावा राजपूतों की एक शाखा है और अपने पूर्वज राव शेखाजी के नाम से शेखावत कहलाते हैं और यह भगवान श्रीराम के वंशज हैं और सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।
1). सुजानसिंह शेखावत ठिकाना छापोली - सुजानसिंह शेखावत राजा रायसाल के दूसरे पुत्र भोजराज के वंशज थे और यह छापोली ठिकाने के अधिपति थे। क्रुर सम्राट औरंगजेब ने अपने सेनापति दाराबखां को खण्डेला राज्य से जजिया कर इकट्ठा करने और वहां के सभी मंदिरों को तोड़ने के लिए तीस हजार सैनिकों की विशाल सेना देकर भेजा। खण्डेला पहुंचकर दाराबखां और उसकी सेना ने मंदिरों को तोड़ना शुरू कर दिया। इस समय सुजानसिंह शेखावत मारवाड़ की सीमा मे विवाह करने के लिए गए हुए थे और विवाह कर अपने ठिकाने छापोली पहुंच रहे थे, तभी रास्ते में उनको सूचना मिली की खण्डेला के मोहनदेवजी के मंदिर को तोड़ने के लिए मुसलमानों की जबरदस्त सेना ने आक्रमण कर दिया है तभी सुजानसिंह शेखावत ने प्रण किया कि मैं मोहनदेवजी के मंदिर की ही नहीं बल्कि खण्डेला के समस्त मंदिरों की रक्षा करूंगा, यदि ऐसा ना कर पाऊं तो अपने प्राण न्यौछावर कर दूंगा। सुजानसिंह शेखावत अपने तीन सौ शेखावत वीर योद्धाओं के साथ मंदिर की रक्षा करने निकल पड़े। सुजानसिंह की छोटी सी टुकड़ी के सामने शत्रुओं की तीस हजार सैनिकों की विशाल सेना थी। राजपूतों की विजय की कोई संभावना थी ही नहीं परंतु राजपूत वीरों ने अपने धर्म, सम्मान व मंदिरों की रक्षा करना ही श्रेष्ठ समझा। इसके बाद मुगल सेना ने मंदिर और शेखावत योद्धाओं पर धावा बोल दिया इसके जवाब में राजपूत सेना ने बड़े ही तीव्रगति से शत्रुओं पर वार किया। सुजानसिंह शेखावत ने अपनी तलवार का ऐसा जौहर दिखाया कि मुगल सेना में हड़कंप मच गई और एक बार तो मुगल सेना पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। दुश्मनों के छक्के छुड़ाते हुए और युद्ध करते हुए सुजानसिंह शेखावत का सर कट गया, परंतु वह शेखावत योद्धा बिना सिर के तलवार लेकर शत्रुओं से भयंकर युद्ध करता रहा और सैंकड़ो दुश्मनों को मौत के घाट उतार दिया। जब तक शेखावत वीरों की तलवारें चल रही थी तब तक मुगल सेना मंदिर का एक पत्थर भी नहीं गिरा सकी। अंत में नील के छींटे देने पर सुजानसिंह शेखावत का धड़ शांत हुआ और सुजानसिंह की धर्मपत्नी अपने वीर पति का कटा सिर गोद में रखकर सती हो गई। इस प्रकार सुजानसिंह शेखावत ने अपने वंश के गौरव को बढ़ाकर अपना नाम इतिहास में अमर कर लिया।
2). अरजनसिंह जूझार
अरजनसिंह बडनगर की ढाणी दूलेसिंह की के निवासी थे। यह क्षेत्र सत्ताईसा के नाम से जाना जाता है। सत्ताईसा क्षेत्र में रतनावत शेखावत आबाद हैं। एक बार अलवर राज्य और करोली तथ राजनौता के रतनावत शेखावतों बीच में सीमा सम्बन्धी विवाद हो गया था।
इस विवाद में आस-पास के रतनावत शेखावत शामिल हुए थे। कारोली गांव के बीच में एक जबरदस्त लड़ाई हुई थी। रतनावत शेखवतों ने अलवर की सेना को पीछे धकेल दिया। इस लड़ाई में 84 रतनावत शेखावत काम आए। अरजनसिंह शेखावत का इस युद्ध में युद्ध करते हुए मस्तक कट गया था। इसके बाद भी वह शत्रुओं से युद्ध करते रहे। युद्ध समाप्ति के बाद उनका धड़ घोड़े पर सवार होकर युद्ध क्षेत्र से अपने गांव की सीमा पर आकर उनका शरीर शांत हो गया।
3).गुमानसिंह शेखावत ठिकाना पचार
सन् 1767ई. में मावड़ा- मान्डोली का युद्ध हुआ था। यह युद्ध भरतपुर के राजा जवाहरसिंह व जयपुर के महाराजा माधोसिंह के बीच में हुआ था। इस युद्ध में भोपालसिंह खेतड़ी, हाथीसिंह सुल्ताना व दौलतसिंह मण्ड्रेला की व्यूह रचना और राजपूत वीरों की वीरता से घबराकर जाट सेना हारकर भाग गई। इस युद्ध में पचार के ठाकुर गुमानसिंह सांवलदासोत शेखावत सिर कटने के पश्चात् भी दोपहर तक तलवार चलाते रहे व दुश्मनों के सिर काटते रहे, बाद में इनका धड़ शत्रुओं को हराकर शांत हुआ।
4). भंवर जूझारसिंह शेखावत ठिकाना सुलताना
विक्रमी संवत 1831 में अराजकता के माहौल में कालेखां बलोच, नजबकुलीखां और समरू जर्मन सेना लेकर आए और खेतड़ी पर आक्रमण करने के लिए निकल पड़े। खेतड़ी के मार्ग में शेखावतों का ठिकाना सुलताना था, आक्रमणकारियों ने शेखावतों की शक्ति को कम करने के उद्देश्य से सुलताना पर आक्रमण कर दिया और सुलतानागढ़ के एक ऊंचे टीले पर मोर्चा जमा लिया। सुलताना के ठाकुर हाथीसिंह के पोते जूझारसिंह शेखावत को मुग़लों द्वारा आक्रमण करने पर बड़ा क्रोध आया और अपनी तलवार लेकर मुगल सेना पर टूट पड़े। एक के बाद एक इन्होंने कई मुगल सैनिकों को मार गिराया और अपने प्रचण्ड राजपूती शौर्य का परिचय दे रहे थे। तभी काफी सारे दुश्मनों से घिरने पर जूझारसिंह का सिर शत्रुओं द्वारा कलम कर दिया गया। लेकिन सिर कटने के बाद भी जूझारसिंह की तलवार रुकी नहीं, बल्कि उनकी तलवार दौगुनी गति से शत्रुओं को जन्नत भेज रही थी। शत्रु सेना का सेनापति कालेखां तो वहां से घबराकर भाग गया और कहा कि यह बिना सिर का काफिर हम सबको मार देगा। वही मुग़ल शत्रु यह दृश्य देखकर अचंभित थे और उनमें भय का माहौल बना हुआ था। तब किसी ने गाय के खून के छिंटे जूझारसिंह पर फेंके, तब उस वीर योद्धा का धड़ शांत हुआ। इस प्रकार जूझारसिंह शेखावत ने बिना सिर के युद्ध कर अपना और शेखावत वंश के नाम को गौरवान्वित किया।
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