वनवास के प्रसंग में लक्ष्मण का जीवन
Автор: DAWN SPIRITUALISM
Загружено: 2025-12-25
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वनवास के प्रसंग में लक्ष्मण का जीवन अनुशासन, सेवा और त्याग का अद्भुत उदाहरण है। वे प्रभु राम और माता सीता की सुरक्षा और सेवा में निरंतर तत्पर रहते थे। प्रातःकाल स्नान कर वे धनुष-बाण लेकर वन की रक्षा करते, साधारण आहार ग्रहण करते और दिनभर आश्रम के चारों ओर पहरेदारी करते। संध्या समय वे अग्नि प्रज्वलित कर आश्रम को सुरक्षित रखते और रात्रि में जागरण करते ताकि किसी संकट का सामना राम और सीता को न करना पड़े।
वनवास के दौरान लक्ष्मण ने राम और सीता के लिए एक साधारण परंतु सुरक्षित कुटिया का निर्माण भी किया। उन्होंने वन से लकड़ियाँ और बांस चुनकर ढाँचा तैयार किया, दीवारों को पत्तों और घास से बुना तथा छत को मोटी घास से ढक दिया ताकि वर्षा का जल भीतर न पहुँचे। कुटिया के भीतर पत्तों की चटाई बिछाई और बाहर अग्नि प्रज्वलन का स्थान बनाया। यह कुटिया उनके परिश्रम और समर्पण का प्रतीक बनी।
इसी वनवास में लक्ष्मण ने सीता की सुरक्षा हेतु आश्रम के चारों ओर एक रेखा खींची, जिसे "लक्ष्मण रेखा" कहा गया। उन्होंने सीता को चेतावनी दी कि इस रेखा को कभी पार न करें। परंतु रावण के छल से सीता ने इसे लाँघा और उनका अपहरण हुआ। यह घटना मर्यादा और सुरक्षा का स्थायी प्रतीक बन गई।
इस प्रकार लक्ष्मण का वनवास जीवन—उनकी दिनचर्या, कुटिया निर्माण और लक्ष्मण रेखा—त्याग, अनुशासन और धर्म की गहन शिक्षा देता है।
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