सुख, दुख का विराम नहीं, बल्कि धोखा है || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2025)
Автор: शास्त्रज्ञान
Загружено: 2026-01-13
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वीडियो जानकारी: 09.09.25, गीता समागम, ग्रेटर नोएडा
Title : सुख, दुख का विराम नहीं, बल्कि धोखा है || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2025)
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यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ।।
~भगवद् गीता (6.22)
जिसे प्राप्त होकर योगी किसी अन्य लाभ को उससे बड़ा नहीं मानते, और जिसमें स्थित होकर वे भारी दुख से भी विचलित नहीं होते — वही योग है।
(काव्य)
चाह सब जिसके लिए
लाभ वो ही मिल गया
आत्मधन इतना बड़ा
लुटता मैं हँसता रहा
विवरण:
इस वीडियो में आचार्य जी, श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक 22 पर चर्चा कर रहे हैं। आचार्य जी समझाते हैं कि जिसे हम सुख कहते हैं, वह वास्तव में दुख का थोड़ी देर के लिए टल जाना मात्र है। वे स्पष्ट करते हैं कि देह, मन और संसार की किसी भी वस्तु से अपनी पहचान जोड़ना ही दुख का मूल कारण है।
आचार्य जी बताते हैं कि “जीवात्मा” या भोक्ता बनने की धारणा संसार के सारे दुखों की जड़ है। योग का अर्थ अहंकार का सत्य से जुड़ जाना है, जहाँ “मेरा” समाप्त हो जाता है और कोई दुख शेष नहीं रहता। सुख की लालसा से मुक्त होकर सहज रूप से जीना ही वास्तविक आनंद और योग है।
🎧 सुनिए #आचार्यप्रशांत को Spotify पर:
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संगीत: मिलिंद दाते
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