पितृ देवता ने लिया अवतार कही गयी ये बात || गढ़वाली जागर || NEW GARHWALI PITRA DEVTA JAGAR || jagar
Автор: UK UTTARAKHAND RAIBAAR
Загружено: 2022-03-04
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यूं तो सभी क्षेत्रों में अलग-अलग वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है, जिनका प्रचलन प्राचीन काल से होता आ रहा है. उनका महत्व उस क्षेत्र के परिवेश, संस्कृति एवं विरासत पर आधारित होता है और सदिvयों से चली आ रही यह क्षेत्रीय हुनरबा जी, कला के क्षेत्र में एक विशेष महत्व रखती है.
(Dhol Damau Uttarakhand)
अगर हम देवभूमि उत्तराखण्ड के वाद्य-यंत्रों का वर्णन करें तो उनमें मुख्य है “ढोल- दमाऊं”. यह वाद्य यंत्र उत्तराखण्ड के पहाड़ी समाज की लोककला को संजोए रखे हुए हैं और उनकी आत्मा से जुड़े हैं. इस कला का जन्म से लेकर मृत्यु तक, घर से जंगल तक अर्थात् प्रत्येक संस्कार और सामाजिक गतिविधियों में इनका प्रयोग होता आ रहा है. इनकी गूंज के बिना यहाँ का कोई भी शुभकार्य पूरा नहीं माना जाता है इसीलिए कहा जाता है कि पहाड़ों में विशेषकर उत्तराखण्ड में त्यौहारों का आरंभ ढोल-दमाऊं के साथ ही होता है.
यह उत्तराखण्ड के सबसे प्राचीन और लोकप्रिय वाद्ययंत्रों में शामिल हैं, इन्हें मंगल वाद्य के नाम से भी जाना जाता है. जनश्रुति है की प्रारम्भ में युद्ध के मैदानों में सैनिकों के कुशल नेतृत्व एवं उनके उत्साह को पैदा करने के लिए इनका उपयोग किया जाता था और फिर यह कला युद्ध के मैदानों से लोगों के सामाजिक जीवन में प्रवेश करते चली गई, अंततः यह शुभ कार्यों के आगमन का प्रतीक बन गई. इसी के साथ पहाड़ों में शुरूआत हुई लोककला की जिसमें इन वाद्य-यंत्रों ने अपनी जगह स्थापित कर ली और आज भी जनमानस के द्वारा इन कलाओं को महत्वपूर्ण दर्जा दिया जा रहा है क्योंकि किसी भी क्षेत्र की पहचान वहां की लोककला,परंपरा,संस्कृति पर निर्भर करती है.
ढोल-दमाऊं के माध्यम से कई प्रकार की विशेष तालों को बजाया जाता हैं. विभिन्न तालों के समूह को ढोल सागर भी कहा जाता है. ढोल सागर में लगभग 1200 श्लोकों का वर्णन किया गया है. इन तालों के माध्यम से वार्तालाप व विशेष सन्देश का आदान-प्रदान भी किया जाता है. अलग समय पर अलग-अलग ताल बजायी जाती है जिसके माध्यम से इस बात का पता चलता है की कौन-सा संस्कार या अवसर है.
इन्हीं तालों में देवी-देवताओं के रूप को जागृत करने के लिए सबसे पहले बजाई जाने वाली ताल, ‘मंगल बधाई ताल’ है. जिसके माध्यम से उनका आवाहन किया जाता है. इसके अतिरिक्त सभी मंगल कार्य, शादी, हल्दी हाथ, बारात प्रस्थान, विभिन्न संस्कारों तथा पूजा-अनुष्ठानों आदि कार्यों में विशेष प्रकार की तालों को बजाया जाता है.
(Dhol Damau Uttarakhand)
इतिहास
इतिहासकारों ने माना है कि ढोल पश्चिम एशियाई मूल का है जिसे 15वी शताब्दी में भारत में लाया गया था. आईन-ए-अकबरी में पहली बार ढोल के संदर्भ में वर्णन मिलता है अर्थात् यह कहा जा सकता हैं कि 16वी शताब्दी के आसपास ढोल की शुरुआत गढ़वाल में पहली बार की गई थी. इतिहास में अनेकों वाद्य यंत्रों में इन्हें भी महत्वपूर्ण दर्जा प्राप्त हुआ, जिन्होंने सम्पूर्ण क्षेत्र में ख्याति प्राप्त की.
महत्व
ढोल-दमाऊ को प्रमुख वाद्य यंत्रों में इसीलिए शामिल किया गया क्योंकि इनके माध्यम से ही देवी-देवताओं का आवाहन किया जाता है और दंतकथाओं के अनुसार ऐसा माना जाता है कि इनकी उत्पत्ति शिव जी के डमरू से हुई है. जिसे सर्वप्रथम भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाया था और वहां मौजूद एक गण द्वारा इन्हें सुनकर याद कर लिया गया और तब से लेकर आज ..
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Hi
I Am Govind Rawat Daira Welcome To Our Youtube
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Dosto Aaj Ki Is Video Mai Aapko Uttarakhand Calturel
Aur Sanskriti Ke Bari
Mai Dekhne ko Mila Dosto Humara En video Madhiyam se
Aaj K Janresan Uttarakhand KI Sanskriti Se Jodana hai;
Umeed Hai Aapko Ye Video Bahut Pasand Aayegi..
Thank You So Much............
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