Rag Adana |jhaptal | Sadra | Vanita s
Автор: Learn with Soham Swar
Загружено: 2025-12-26
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अड़ाना की उत्पत्ति आसावरी थाट से मानी गई है। इसमें ग ध कोमल और दोनों निषाद प्रयोग किये जाते है। इसका वादी स्वर तार सा और संवादी पंचम है रात्रि के तीसरे प्रहर में इसे गाया- बजाया जाता है। आरोह में गंधार वर्ज्य है और अवरोह में वक्र है इसलिये इसकी जाति षाडव- सम्पूर्ण मानी जाती हैं।
कोमल ग- ध दोउ निषाद, मानत स- प सम्वाद।
तृतीय रात्रि गावत गुनिजन,चढत न ग लगात।।
पारंपारिक रचना
स्थाई : राम चढ़ो रघुवीर
रणधीर गढ़ लंका को
सैंग लछुमन लिए बढ़ो धनुषधारी
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