परिपूर्ण प्रभु हूँ, न कुछ चाहता हूँ।
Автор: आत्मन
Загружено: 2026-01-03
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परिपूर्ण प्रभु हूँ,
न कुछ चाहता हूँ।
स्वतः एव तृप्त रहा चाहता हूँ।।
स्वाधीन ही होवे जग परिणमन सब, कर्तृत्व झूठा दुखमय दिखे अब। प्रभु जैसी ज्ञाता दशा चाहता हूँ।। 1।।
परिपूर्ण प्रभु हूँ,
न कुछ चाहता हूँ।
स्वतः एव तृप्त रहा चाहता हूँ।
।अनादि अनंत स्वभाव न तजता, अन्तर से देखो न परभाव गहता । ध्रुवरूप का अनुभवन चाहता हूँ।। 2 ।।
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