जय राम सदा सुखधाम हरे (jaya rāma sadā sukhadhāma hare)
Автор: RamcharitManas-Kashi
Загружено: 2020-09-26
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छं. जय राम सदा सुखधाम हरे। रघुनायक सायक चाप धरे ॥
भव बारन दारन सिंह प्रभो। गुन सागर नागर नाथ बिभो ॥
तन काम अनेक अनूप छबी। गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी ॥
जसु पावन रावन नाग महा। खगनाथ जथा करि कोप गहा ॥
जन रंजन भंजन सोक भयं। गतक्रोध सदा प्रभु बोधमयं ॥
अवतार उदार अपार गुनं। महि भार बिभंजन ग्यानघनं ॥
अज ब्यापकमेकमनादि सदा। करुनाकर राम नमामि मुदा ॥
रघुबंस बिभूषन दूषन हा। कृत भूप बिभीषन दीन रहा ॥
गुन ग्यान निधान अमान अजं। नित राम नमामि बिभुं बिरजं ॥
भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं। खल बृंद निकंद महा कुसलं ॥
बिनु कारन दीन दयाल हितं। छबि धाम नमामि रमा सहितं ॥
भव तारन कारन काज परं। मन संभव दारुन दोष हरं ॥
सर चाप मनोहर त्रोन धरं। जरजारुन लोचन भूपबरं ॥
सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं। मद मार मुधा ममता समनं ॥
अनवद्य अखंड न गोचर गो। सबरूप सदा सब होइ न गो ॥
इति बेद बदंति न दंतकथा। रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा ॥
कृतकृत्य बिभो सब बानर ए। निरखंति तवानन सादर ए ॥
धिग जीवन देव सरीर हरे। तव भक्ति बिना भव भूलि परे ॥
अब दीन दयाल दया करिऐ। मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ ॥
जेहि ते बिपरीत क्रिया करिऐ। दुख सो सुख मानि सुखी चरिऐ ॥
खल खंडन मंडन रम्य छमा। पद पंकज सेवित संभु उमा ॥
नृप नायक दे बरदानमिदं। चरनांबुज प्रेम सदा सुभदं ॥
दो. बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात।
सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात ॥ १११ ॥
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