कबीर अमृतवाणी I परम सत्य निर्गुण, निराकार, अवर्णनीय और अद्वैत है I कबीर निर्गुण–अवस्थात्मक दर्शन I
Автор: Kabir Vaani
Загружено: 2026-01-07
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इसमें सृष्टि-उत्पत्ति से पूर्व की उस परम अवस्था का वर्णन है, जहाँ कोई भेद, आकार या नियम नहीं था। सृष्टि, शास्त्र, भाषा, गुरु–शिष्य ये सब उसी के प्रकट रूप हैं I
भावार्थ / व्याख्या
कबीर कहते हैं—जिस अवस्था में न वायु थी, न जल, वहाँ सृष्टि की उत्पत्ति कैसे कही जाए? अर्थात सृष्टि से पहले एक ऐसी निराकार स्थिति थी जहाँ पंचतत्त्वों का भी अस्तित्व नहीं था।
उस अवस्था में न कली थी, न फूल; न गर्भ था, न मूल। यानी जन्म, विकास और कारण–कार्य का कोई क्रम नहीं था।
न विद्या थी, न वेद; न शब्द था, न शब्दों का विस्तार। अर्थात ज्ञान के शास्त्रीय रूप और भाषा भी वहाँ अप्रासंगिक थे।
न शरीर (पिंड) था, न निवास; न पृथ्वी थी, न आकाश। समस्त स्थूल और सूक्ष्म जगत का अभाव था।
न गुरु था, न शिष्य; न गम्य–अगम्य का भेद, न कोई मार्ग। यानी साधना के साधन भी नहीं थे, क्योंकि द्वैत ही नहीं था।
साखी का भाव
कबीर कहते हैं—उस अविगत्य (जिसे जाना नहीं जा सकता) की गति क्या कहूँ? उसका न कोई गाँव है, न ठिकाना।
वह गुणों से परे है, उसे देखा नहीं जा सकता—तो उसका नाम लेकर क्या कहा जाए?
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