thoda sa gham ghazal
Автор: Guldasta-e-Nazm
Загружено: 2025-12-17
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thoda sa gham ghazal
जो हिस्से में आया मेरे, थोड़ा सा ग़म,
*मयख़ाने में हुआ कम, थोड़ा सा ग़म*
जो हिस्से में आया मेरे, थोड़ा सा ग़म,
*मयख़ाने में हुआ कम, थोड़ा सा ग़म*
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*आईने में देखा तो पूरा न था कोई*
हर शख़्स में है छुपा अधूरा सा कोई
हँसते चेहरों के पीछे ठहरा सा कोई
ख़ुद से ही हार गया, जीता सा कोई
*हर दिल में है एक वहम, थोड़ा सा ग़म*
*मयख़ाने में हुआ कम, थोड़ा सा ग़म*
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*ख़्वाहिशें पूरी हों तो सुकूँ मिल जाए*
पर सुकूँ मिलते ही नई कमी जग जाए
जो मिल गया, वही बोझ बन जाए
इंसान को इंसान से दूर कर जाए
*हर चाहत का यही करम, थोड़ा सा ग़म*
*मयख़ाने में हुआ कम, थोड़ा सा ग़म*
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*रिश्तों में भी अब पूरी बात कहाँ*
लफ़्ज़ों में सिमटी है हर जज़्बात कहाँ
साथ होकर भी वो साथ कहाँ
दिल तो हैं पास, पर मुलाक़ात कहाँ
*हर मुलाक़ात में है कम, थोड़ा सा ग़म*
*मयख़ाने में हुआ कम, थोड़ा सा ग़म*
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*ख़ुद को समझना सबसे मुश्किल रहा*
जो सबसे क़रीब था, वही फ़ासिल रहा
भीड़ में रहकर भी दिल तन्हा रहा
पूरे होने का सपना ही हासिल रहा
*इंसान का यही भरम, थोड़ा सा ग़म*
*मयख़ाने में हुआ कम, थोड़ा सा ग़म*
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*वक़्त ने सिखाया सब सह लेना*
टूटकर भी सीधा रह लेना
अधूरा रहकर भी पूरा लग लेना
अपने ही सवालों को अनसुना कर लेना
*ज़िंदगी का यही आलम, थोड़ा सा ग़म*
*मयख़ाने में हुआ कम, थोड़ा सा ग़म*
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जो हिस्से में आया मेरे, थोड़ा सा ग़म,
*मयख़ाने में हुआ कम, थोड़ा सा ग़म*
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