सिष का माना सतगुरु | Sish Ka Maana Satguru | Sehjo bai Bhajan By Kahat Kabir Official Channel
Автор: कहत कबीर
Загружено: 2026-01-15
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यह भजन सहजो बाई जी की निर्गुण संतवाणी का अत्यंत सशक्त उदाहरण है, जिसमें सच्चे शिष्य की पहचान और गुरु के प्रति अडिग श्रद्धा का भाव प्रकट होता है।
सहजो बाई जी कहती हैं कि शिष्य को गुरु की डाँट-फटकार, परीक्षा और सुधार को भी प्रेमपूर्वक स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि वही आत्म-उत्थान का मार्ग है।
गुरु के द्वार को कभी नहीं छोड़ना, अपने कुल-अभिमान, अहंकार और झूठ को त्यागकर गुरु के सामने सब कुछ खोल देना—यही सच्ची साधना है।
गुरु ही सब दुखों का नाश करते हैं, क्योंकि वे मन की हर परत को जानते हैं।
जो शिष्य गुरु के प्रति सत्य, सेवा और समर्पण में स्थित रहता है, वही मोह के जाल से मुक्त होता है।
“कहत कबीर” चैनल ऐसे ही संतों की अमृतवाणी को आज की पीढ़ी तक शुद्ध भाव और सरल भाषा में पहुँचाने का प्रयास है।
(भावार्थ)
“सिष का माना सतगुरु, गुरु झिडकै लख बार।
सहजो द्वार न छोड़िये, यही धारना धार॥”
अर्थ:
शिष्य का धर्म है कि वह अपने सतगुरु को ही सत्य माने।
यदि गुरु लाख बार भी डाँटें, सुधारें या कठोर वचन कहें,
तो भी गुरु का द्वार कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
यही शिष्य की सबसे बड़ी साधना और अटल धारणा होनी चाहिए।
“गुरु दर्शन कर सहजिया, गुरु का कीजै ध्यान।
गुरु की सेवा कीजिये, तजिये कुल अभिमान॥”
अर्थ:
सरल हृदय से गुरु के दर्शन करो और उनका ध्यान करो।
गुरु की सेवा करो और अपने कुल, जाति, मान-सम्मान का अहंकार छोड़ दो।
गुरु-मार्ग पर चलने के लिए अहंकार का त्याग आवश्यक है।
“सतगुरु दाता सब के, तू किरपिन कंगाल।
गुरु महिमा जाने नहीं, फस्यो मोह के जाल॥”
अर्थ:
सतगुरु सभी को देने वाले हैं,
लेकिन शिष्य स्वयं कंजूस और आत्मिक रूप से निर्धन बना रहता है।
वह गुरु की महिमा नहीं समझ पाता क्योंकि
वह संसार के मोह-जाल में फँसा हुआ है।
“गुरु सूँ कछु न दुराइये, गुरु सूँ झूठ न बोल।
बुरी भली खोटी खरी, गुरु आगे सब खोल॥”
अर्थ:
गुरु से कुछ भी छिपाना नहीं चाहिए और उनसे झूठ नहीं बोलना चाहिए।
अपनी अच्छाई-बुराई, सही-गलत — सब कुछ गुरु के सामने खोलकर रख देना चाहिए।
पूर्ण सत्यता ही गुरु-कृपा का द्वार खोलती है।
“सहजो गुरु रक्षा करें, मिटैं सब दुख दून्द।
मन की जानैं सब गुरु, कहा छिपावै अन्ध॥”
अर्थ:
सहजो कहती हैं कि गुरु स्वयं शिष्य की रक्षा करते हैं
और उसके सारे दुःख-क्लेश मिटा देते हैं।
गुरु तो मन के भीतर की हर बात जानते हैं,
तो फिर अज्ञानवश उनसे कुछ छिपाया ही क्या जा सकता है?
This powerful Nirgun bhajan by Sehjo Bai Ji reveals the true essence of the Guru–Disciple relationship.
She teaches that a sincere disciple must accept even the Guru’s scolding as grace, because correction leads to inner awakening.
Never leaving the Guru’s door, abandoning ego and false pride, and opening one’s entire being before the Guru—this is true spiritual practice.
The Guru removes all suffering because nothing remains hidden from true wisdom.
A disciple rooted in truth, service, and surrender becomes free from illusion and attachment.
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