शारीरिक ,संज्ञानात्मक ,सामाजिक ,संवेगात्मक विकास
Автор: BHARGAVA CLASS
Загружено: 2017-11-17
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सामाजिक विकास
सामाजिक विकास सिखने की वह प्रक्रिया है जो समूह के स्तर,परम्पराओ तथा रीती -रिवाजो के अनुकूल अपने आप को ढालने तथा एकता ,मेल - जोल और पारस्परिक सहयोग की भावना भरने में सहायक होती है
कुछ प्रमुख परिभाषा
1- सोरेन्सन- सामाजिक बुद्धि एवं विकास से हमारा तातपर्य अपने साथ और दुसरो के साथ भली - भांति चलने की बढ़ती हुई योग्यता से है
2- हरलॉक- सामाजिक विकास से अभिप्राय सामाजिक सम्बन्धो में परिपक्वता प्राप्त करने से है
इससे निम्न बातें सामने आती है
बच्चे की दूसरे वयक्तियो के सम्पर्क में आने के साथ ही समाजीकरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है
समाजीकरण की प्रक्रिया से वयक्ति अनेक सामाजिक गुणों को सिखने में सहायता प्राप्त करता है
इस प्रकार से अर्जित ज्ञान वाला वयक्ति समाज के साथ जल्दी ताल मेल बिठा सकता है
शैशवास्था में सामाजिक विकास -
इस अवस्था में बालक सामाजिकता से परे होता है (इसमें बालक को कोई मतलब नहीं होता सामाजिकता से )वह मात्र अपनी शारीरिक अवाश्य्कताओ की पूर्ति में लगा रहता है(जैसे बच्चा को भूख लगता है और वह चिलता है जैसे ही खाने को मिला वह शांत हो जाता है ) बच्चो में सामाजिक व्यव्हार तब प्रकट होता है जब वह वयक्तियो तथा वस्तुओ में अंतर को समझने लगता है
बाल्यावस्था में सामाजिक विकास -
इस अवस्था में बच्चो में समायोजन तथा समूह बनाने की छमता का विकास होता है (बच्चे ज्यादा से ज्यादा समूह बनाते है इस अवस्था में ही सामाजिक विकास होता है इस अवस्था में बच्चे समझने लगते है समानुभूति बढ़ती है )
किशोरवस्था में सामाजिक विकास -
इस अवस्था में किशोर किसी अन्य किशोर या किशोरी के साथ समूह बनाने की कोशिस करते है
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