અદ્ભુત સ્થાપત્યનો ખજાનો: હમીરપુરા (મીરપુર) ભીડભંજન પાર્શ્વનાથ તીર્થનો ઈતિહાસ | Hamirpura Parshwanath
Автор: Kajal ni Vaato
Загружено: 2025-07-25
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ગુજરાતની નજીક, રાજસ્થાનના સિરોહી જિલ્લામાં આવેલું આ તીર્થધામ ૧૨૦૦ વર્ષથી વધુ પ્રાચીન છે!
આ વીડિયોમાં અમે તમને શ્રી હમીરપુરા (મીરપુર) પાર્શ્વનાથ ભગવાનના દર્શન કરાવવાની સાથે આ ભવ્ય જિનાલયનો રોમાંચક ઈતિહાસ જણાવીશું. અહીં બિરાજમાન શ્રી ભીડભંજન પાર્શ્વનાથ દાદાની સફેદ આરસપહાણની પ્રતિમા અદ્ભુત છે.
કહેવાય છે કે આ તીર્થના સ્થાપત્ય અને કોતરણી માંથી પ્રેરણા લઈને જ વિશ્વપ્રસિદ્ધ દેલવાડા અને રણકપુરના જૈન મંદિરોનું નિર્માણ થયું હતું. ૯મી સદીમાં બનેલું રાજસ્થાનનું આ સૌથી પ્રાચીન આરસપહાણનું સ્મારક કેમ કહેવાય છે? મહમૂદ બેગડા દ્વારા થયેલા વિનાશ છતાં આ મંદિર ફરી કેવી રીતે ઉભું થયું?
પર્વતોની ગોદમાં શાંતિ અને આસ્થાનું કેન્દ્ર એવા આ પ્રાચીન જૈન તીર્થની સંપૂર્ણ ગાથા જાણવા માટે વીડિયોને અંત સુધી જુઓ.
🙏 જો તમને આ ઐતિહાસિક તીર્થ વિશે જાણીને આનંદ થયો હોય તો વીડિયોને લાઈક કરો અને ચેનલને સબ્સ્ક્રાઇબ કરો.
श्री मीरपुर तीर्थ
अलौकिक , अतिप्राचिन श्री मीरपुर तीर्थ ( हमीरगढ़ या हमीरपुर ) का इतिहास।
"पंथे जुहारु, संप्रति रायना चैत्य, हमीरपुरे प्रभु पारसजी, हुं वंदु नित नित..."
श्री तीर्थमाला संग्रह में लिखी हुई इस पंक्ति इस तीर्थ की प्राचीनता दर्शित करती है।
राजस्थान की धरा पर जिरापल्ली पटन नाम का प्राचीन नगर था। यहाँ पर संप्रति महाराजाने पार्श्वनाथ भगवान का जिनालय बनाया था। विक्रम संवत् ८०८ में यहां पर हमीर राजाने चढाई की। इस गढ को जीता।
हमीर राजाने इस जिरापल्ली पटन का नाम बदलकर हमीरगढ रखा। कालक्रम से वह नाम अपभ्रंश होते हुए हमीरपुर और हमीरपुर से मीरपुर हुआ। इतने प्राचीन इस नगर में जयानंदसूरिजी, जो प्रभु वीर के २९ वें पाट पर बिराजमान थे, उनके उपदेश से सामंत मंत्री ने मंदिर का निर्माण करवाया था। यह २३वें जैन तीर्थंकर, पार्श्व को समर्पित है। हमीरपुर के ही श्रेष्ठीवर्य श्री कडुआ सेठ ने संवत् १३२८ में बाडमेर में पार्श्वनाथ बिंब की स्थापना करवाई थी।यहाँ के मंदिरों को महमूद बेगड़ा ने नष्ट कर दिया था।वि.सं.१५५६ में आचार्य हेमविजय सूरि जी के सदुपदेश से हमीरगढ़ के जिनालय का जीर्णोद्धार हुआ।शिलालेख के अनुसार संवत १५५२ में आगे की देवकुलिकाए बनी, जो पाटन, खंभात आदि के श्रावको ने बनवाई थी। हमीरपुरा पार्श्वनाथ प्रभु का जो प्राचीन जिनालय है वो श्री जिरापल्लीश प्रसाद, श्री जीरावला पार्श्वनाथ प्रसाद, श्री महाराज राणाजी प्रसाद एवं श्री जगन्नाथ प्रसाद ऐसे नामो से प्रख्यात था। आज विद्यामान चारो जिनमंदिर इस बात की साक्षी है कि, हमीरपुर एक समय में जैन समाज का मुख्य सांस्कृतिक एवं व्यापार का केन्द्र हुआ करता था।
पार्श्वगच्छ के संस्थापक श्री पार्श्वचन्द्रसूरिजी के जन्म से संवत् १५३६ में यह भूमि पावन बनी थी, तो संवत् १५३६ में मौन एकादशी की कथा रचकर सौभाग्यनंदीसूरिजी ने इस भूमि को तेजवंत बनाया था।
इ.स. १७९६ के बाद इस नगर का पतन हुआ। उसके कारण यहा बिराजित प्रतिमाए आसपास के गांवो मे स्थलांतरित की गई। उसी समय यहा पर बिराजित गोडीजी पार्श्वनाथ प्रभु को मुंबई-पायधुनी जिनालय में प्रतिष्ठित किया है।
यहा से ही सो साल पहेले एक प्रतिमा हाडेचा नगर में ले गये है, जो आज हाडेचा नगर में छोटे आदिनाथ के नाम से प्रसिद्ध है।
यहा पर विराजमान हमीरपुरा पार्श्वनाथ भगवान १०८ पार्श्वनाथ तीर्थ में भीडभंजन पार्श्वनाथ के नाम से प्रख्यात है। इस बात का उल्लेख संवत् १८८१ में खुशालविजयजी के शिष्य उत्तमविजयजी ने बनाये हुए छंद में इस प्रकार मिलता है।
"हमीरपुरा पास प्रणमु वली नवलखा, भीडभंजन प्रभु भीड भांगे ।दुःखभंजन अने डोकरीया नमुं,पास जिरावला जगता जागे ।।"
विक्रम संवत १९५९ जेठ वद ८ तारीख़ १९ मई इस्वी स. १९०३ के दिन सेठ कल्याणजी परमानंदजी पेढी ने नांदीया दरबार में रूपये ७१/- किमत चुकाकर इस मंदिर और धर्मशाला की व्यवस्था अपने हाथ ली, आज भी यह व्यवस्था संभाल रहे है। सेठ कल्याणजी परमानंदजी पेढी ने प. पू. आचार्य विजय सुशीलसागरजी म. सा. की निश्रा में सवंत २०३८ज्येष्ठ सुदी ५ (ई. स.१९८२) में प्रतिष्ठा करवाई। पश्चात ई. स. १७-१२-२०१२ से ०६-०३-२०१४ के बीच प. पु. आचार्य श्री रत्नाकरसुरीश्री म. सा. की निश्रा में श्री रामसीन जैन संघ, रामसीन ने इस मंदिर की देवकुलिका का जिर्णोद्धार करवाया।श्री मुनिसुव्रत स्वामी जिनालय की प्रतिष्ठा महा वद १२ संवत २०८० ,गुरूवार,दिनांक ७-०३-३०२४ को संपन्न हुयी है । यहाँ पर संवत २०८१ महा वद-१० में यहाँ के प्राचीन महावीर स्वामी का संपूर्ण जीर्णोद्धार श्री दांतराई जैन संघ ने प्राचीन देलवाडा (मेवाड) तीर्थोद्धारक, गच्छाधिपति परम पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय सोमसुंदरसूरीश्वरजी महाराजा की निश्रा में नुतन श्री शांतिनाथ जिनालय की प्रतिष्ठा संपन्न हुयी है ।
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