धामधनी के दिव्य बाज़ुबन्ध का नूर।फुंदन-झाबे की दिव्य शोभा |श्री सिंगार ग्रंथ प्र-18 चौ :26-30
Автор: Nijdham
Загружено: 2025-11-25
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श्री सिंगार ग्रंथ प्र-18 चौ :26-30—
का दिव्य रस
इन चौपाइयों में वर्णित है—
🌸 फुंदनों की अनंत झाबे
🌸 बाजूबंधों में लगे अनेक रत्न
🌸 हर फुंदन से निकलती अलग-अलग ज्योति
🌸 रत्नों की किरणें और तरंगों की झलक
🌸 जरी, रेशम और स्वर्ण की आभा
🌸 श्री राजजी की बाहों का नूर जब चलता है तो कैसे पूरा आकाश हिलता प्रतीत होता है
यह वर्णन कोई सांसारिक आभूषण नहीं—
बल्कि परमधाम की प्रकाशमय शोभा का सूक्ष्म स्वरूप है।
चौपाइयों में धनी की ऐसी लीला वर्णित है जिसमें—
✨ रत्नों के रंग अनेक हैं, पर प्रकाश सब एक है
✨ किरणों में अनंत तरंगें हैं, पर मूल नूर एक ही है
✨ श्री राजजी की चाल के साथ समस्त प्रकाश झूमता हुआ प्रतीत होता है
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