पावन आरंभिक मंगलाचरण |श्री परिक्रमा ग्रंथ सहूर।DAY :4
Автор: Nijdham
Загружено: 2025-10-26
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मंगलाचरण
जो पूरे ग्रंथ की आत्मा है। इसमें श्री राज-श्यामा जी की दिव्य लीला का आवाहन,
अक्षरधाम से परे स्थित श्री परमधाम की अनंत शोभा, और
माया-मोह से मुक्त आत्मा के जागरण का रहस्य निहित है।
जहाँ श्री राजजी आत्माओं से कह रहे हैं —
“हे ब्रह्म आत्माओ, तुम मेरे निज वतन की हो,
अपना मूल स्वरूप पहचानो और श्री परमधाम को अपने हृदय में धारण करो।”
यह मंगलाचरण स्पष्ट करता है कि —
सभी शास्त्र, वेद, कतेब और महात्मा जहाँ तक पहुँचे,
वह केवल अक्षर या निरंजन की सीमा तक है।
परन्तु महामती जी उस परे के सत्य को उद्घाटित करते हैं,
जहाँ से परमधाम की लीला आरंभ होती है।
श्री परमधाम के 25 पक्षों की शोभा For Beginner॰
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